Thursday, 3 July 2014

संवेदना का क्रियान्वयन कैसे होता है ?

सुख , दुःख की भावनाओं  को प्रकट करने के लिए हमारी संवेदना ने  विभिन्न  अभिव्यक्तियों का सहारा लिया, इन्हीं अभिव्यक्तियों को  विभिन कलाओं का नाम दिया गया  जैसे, नृत्य, संगीत, साहित्य, इत्यादि. 

यही कलाएं, व्यापक कला अर्थात सृष्टि की  कला के  विराट रूप को सूक्ष्म रूप में परिवर्तित करते हुए  सृष्टिके सभी तत्वों में सामजस्य स्थापित करने का कार्य करती हैं। अब एक महत्वपूर्ण प्रश्न  पैदा होता है कि इस सामजस्य को स्थापित करने के लिए हमने जिस भावना का उल्लेख किया है  अर्थात संवेदना, उसका क्रियान्वयन कैसे होता है. किस प्रकार  वह अभिव्यक्ति को विभिन्न  कलाओं में परिवर्तित  करने की क्षमता रखती है. 

इसे समझने के लिए सृष्टि की रचना के पीछे छुपे दर्शन को जानना आवश्यक  है. सृष्टि का सार  केवल  दो शब्दों में  निहित है वह दो शब्द हैं प्रकाश एवं अन्धकार. इन्ही दो शब्दों की परिक्रमा  करते करते सारी  सृष्टि  अपनी यात्रा  करती चली जाती है. 

अंधकार प्रतीक है दुःख का तथा प्रकाश प्रतीक है सुख का . इन्हीं सुख दुःख की भावना की परिक्रमा हम सब करते हैं किन्तु यह सब अनायास  नहीं होता इस परिक्रमा को करने के लिए हमारी सम्वेंदना को विभिन रसों की सहायता  लेनी पड़ती है 

ये नौ रस  हैं शृंगार रस , हास्य रस ,वीभत्स्य रस ,रौद्र रस , शांत ऱस ,वीर ऱस ,करुण  रस ,भयानक रस , अदभुत  रस. ये सभी रस इन्ही दो शब्दों का प्रतिनिधित्व करतें हैं अर्थात, अंधकार और प्रकाश का . 

इस प्रकार हमारी संवेदना  नौ रसों  का निष्पादन सभी कलाओं में  करके जीवन की रचना का इस तरह निर्माण करती है जिससे कि  जीवन में  अंधकार और प्रकाश को प्रकट करते हुए सृष्टि की कला और उसकी पृष्ठमूमि में  छुपे दर्शन को आधार  बनाकर विधाता के किसी बड़े लक्ष्य की संरचना में  सहयोग मिल सके।  

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सम्पूरणता में परस्पर जुडाव का क्रियात्मक रूप क्या है ?

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Wednesday, 2 July 2014

सम्पूरणता में परस्पर जुडाव का क्रियात्मक रूप क्या है ?


निसंदेह अध्यात्म की परिभाषा में  जब सम्पूरणता की बात होती है तो  सम्पूरणता के परस्पर जुड़ाव को समझना जरुरी है. 

इस सृष्टि के जितने भी तत्व हैं. वह इच्छा अथवा अनिच्छा से  परस्पर पूरी तरह से जुड़े हुए हैं. सृष्टि का प्रत्येक  जीव बिना प्राकृतिक संसाधनों का  उपभोग किये बिना नहीं रह सकता , चाहे भोजन हो, पानी हो या सूर्य की धूप  की आवश्यकता हो, प्राणो के लिए वायु की जरूरत हो. 

यह सब क्रियाएँ आपस में  इतने महीन ढंग से जुड़ी  हुई हैं कि सामान्यता हमें इसका आभास ही नहीं रहता।   

प्रकृति से जुड़ने की क्रिया को हम अनायास भी कह सकतें हैं किन्तु पारस्परिक संबंधों  के जुड़ाव को हम सायास कहेंगे तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह चाहे तो छोड़े जा सकते हैं या उनके बिना हमारा काम चल सकता है. 

जुड़ाव की यह प्रक्रिया नैसर्गिक है. किन्तु इन जुड़ावों  के निरंतर प्रचलन और उसके निरंतर विकास के लिए सामाजिक मान्यताएं/संस्कृतियाँ सहायता के लिए प्रयोग की गईं  जिन्होनें जुड़ाव की प्रक्रिया  को सुमधुर और सुन्दर बना दिया. जिसका परिणाम यह निकला की जुड़ाव की इस  प्रक्रिया में  परस्पर प्रेम ने बंधन का कार्य किया।  

इस प्रेमबंधन ने सृष्टि के सभी जीवों में  संवेदना और संवेदनशीलता के लिए स्थान बनाया और हम सब एक दूसरे के लिए सुखकारक बनने लगे. एक दुसरे के बिना हमें अच्छा नहीं लगने लगा।  अपने इन्हीं सुख , दुःख की भावनाओं  को प्रकट करने के लिए हमारी संवेदना ने  विभिन्न  अभिव्यक्तियों का सहारा लिया, इन्हीं अभिव्यक्तियों को  विभिन कलाओं का नाम दिया गया  जैसे, नृत्य, संगीत, साहित्य, इत्यादि. 

यही कलाएं, व्यापक कला अर्थात सृष्टि की  कला के  विराट रूप को सूक्ष्म रूप में परिवर्तित करते हुए  सृष्टिके सभी तत्वों में सामजस्य स्थापित करने का कार्य करती हैं।  

सम्पूरणता में परस्पर जुडाव का क्रियात्मक रूप क्या है ?


संवेदना का क्रियान्वयन कैसे होता है ?

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Tuesday, 1 July 2014

अध्यात्म क्या है ?


प्रश्न : अध्यात्म क्या है ?

जब हम यह मान लें कि  यह सृष्टि ईश्वर द्वारा रचित एक कला ही है. तो इसकी समूर्णता को भी मानना उचित है . अर्थात जब कोई कला सम्पूर्ण हो तो उसके सभी अंग परस्पर जुड़े होंगे और संपूरणता से  जुड़ने की क्रिया का नाम ही अध्यात्म है  संक्षेप में  कहें तो ,अध्यात्म सृष्टि के सभी तत्वों को परस्पर जोड़ने/परस्पर जुड़ने की क्रिया का ही एक व्यापक और विराट प्रयास है. 



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Monday, 30 June 2014

कला क्या है ?


प्रश्न  : कला क्या है?


कला की अनेक परिभाषाएँ हैं. किन्तु यदि आध्यात्मिक दृष्टि से आकलन करें तो लगता है कि यह संपूर्ण सृष्टि  ईश्वर की कला है. इस सृष्टि में  विद्यमान  समस्त कण कला का मूर्त रूप हैं  इसी क्रम में ईश्वर की सबसे महत्वपूर्ण कृतियां हैं धरती, आकाश, जल, अग्नि और वायु. मनुष्य, जीव जंतु, पक्षी, पेड़ पौधे और सभी निर्जीव पदार्थ भी ईश्वर की व्यापक कला का ही परिणाम हैँ . किंतु कला की परिभाषा अध्यात्म की दृृष्टि  से देखने के लिए अनिवार्य है कि पहले यह जाना जाये की अध्यात्म क्या है ?

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