Wednesday, 2 July 2014

सम्पूरणता में परस्पर जुडाव का क्रियात्मक रूप क्या है ?


निसंदेह अध्यात्म की परिभाषा में  जब सम्पूरणता की बात होती है तो  सम्पूरणता के परस्पर जुड़ाव को समझना जरुरी है. 

इस सृष्टि के जितने भी तत्व हैं. वह इच्छा अथवा अनिच्छा से  परस्पर पूरी तरह से जुड़े हुए हैं. सृष्टि का प्रत्येक  जीव बिना प्राकृतिक संसाधनों का  उपभोग किये बिना नहीं रह सकता , चाहे भोजन हो, पानी हो या सूर्य की धूप  की आवश्यकता हो, प्राणो के लिए वायु की जरूरत हो. 

यह सब क्रियाएँ आपस में  इतने महीन ढंग से जुड़ी  हुई हैं कि सामान्यता हमें इसका आभास ही नहीं रहता।   

प्रकृति से जुड़ने की क्रिया को हम अनायास भी कह सकतें हैं किन्तु पारस्परिक संबंधों  के जुड़ाव को हम सायास कहेंगे तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह चाहे तो छोड़े जा सकते हैं या उनके बिना हमारा काम चल सकता है. 

जुड़ाव की यह प्रक्रिया नैसर्गिक है. किन्तु इन जुड़ावों  के निरंतर प्रचलन और उसके निरंतर विकास के लिए सामाजिक मान्यताएं/संस्कृतियाँ सहायता के लिए प्रयोग की गईं  जिन्होनें जुड़ाव की प्रक्रिया  को सुमधुर और सुन्दर बना दिया. जिसका परिणाम यह निकला की जुड़ाव की इस  प्रक्रिया में  परस्पर प्रेम ने बंधन का कार्य किया।  

इस प्रेमबंधन ने सृष्टि के सभी जीवों में  संवेदना और संवेदनशीलता के लिए स्थान बनाया और हम सब एक दूसरे के लिए सुखकारक बनने लगे. एक दुसरे के बिना हमें अच्छा नहीं लगने लगा।  अपने इन्हीं सुख , दुःख की भावनाओं  को प्रकट करने के लिए हमारी संवेदना ने  विभिन्न  अभिव्यक्तियों का सहारा लिया, इन्हीं अभिव्यक्तियों को  विभिन कलाओं का नाम दिया गया  जैसे, नृत्य, संगीत, साहित्य, इत्यादि. 

यही कलाएं, व्यापक कला अर्थात सृष्टि की  कला के  विराट रूप को सूक्ष्म रूप में परिवर्तित करते हुए  सृष्टिके सभी तत्वों में सामजस्य स्थापित करने का कार्य करती हैं।  

सम्पूरणता में परस्पर जुडाव का क्रियात्मक रूप क्या है ?


संवेदना का क्रियान्वयन कैसे होता है ?

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